आज शाम बैठा था खुद के साथ ,
मन में करता विचार कुछ कल्पनाओं के साथ,
लेकर अपनी भावना अपने भूत के साथ ,
सोचता रहा मैं अपने भविष्य के साथ॥
क्या बैचेनी थी ये ,क्या ये अनुभव था l
एक में था ,एक मेरी बर्बादी का मंजर था ॥01॥
दुख होता है ,देख कर ,गलत किया उसने ,
दिल दुखता है ,सोच कर धोखा किया उसने,
मन कांपता है ,चिंता कर झांसा दिया उसने,
मस्तिक सताता , ख्याल कर छल किया उसने॥
क्या दुविधा थी ये , क्या ये मंजर था l
एक मैं था, एक मेरी यादों का खंजर था ॥ 02॥
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CP@AKP
©poemearth
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