प्रेम है अगन, विरह है पानी,
दोनों में बसी, एक अधूरी कहानी।
जहाँ प्रेम लाया बसंत, विरह ने लायी शरद,
एक में है खुशियाँ, दूसरे में बरसता मरुथल।
ज़िन्दगी की इस दौड़ में, प्रेम है विश्राम,
विरह वो पहेली, जिसका नहीं कोई आराम।
तू मेरे पास होते हुए भी, क्यों लगता है दूर,
ये प्रेम नहीं तो क्या है, जो करे मुझे मजबूर।
फिर भी ये दिल चाहता है, बस तेरा ही साथ,
विरह की इस पीड़ा में भी, तू ही मेरी बात।