ऐसी बात बनाता है वो,जैसे पतंग की कोई डोर
नज़र ऐसे आता है वो, जैसे सूरज निकले भोर
वो मुझे अब हर–कहीं सुनाई देने लगा है यारों
होऊं चाहे मैं तन्हा या हो चार–सूं मेरे कोई शोर
उसकी यादों से इतनी वाबस्तगी हो गई है मेरी
भूल नहीं पाता हूं चाहे कितना लगा लूं मैं जोर
कभी–कभी वो इतना ज़्यादा रुला जाता है मुझे
याद आए जब भी,भीग जाती हैं आंखों की कोर
बड़ी कश्मकश है, है एहसास ओ रफअ़त बहुत
कैसे कहूं.?है वो मोरनी गर,मैं ठहरा उसका मोर
©zulqarnain
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