अकेलापन

सन्नाटे में खोई आँखें
किनारों पर टिकी हुई
हर सांस में एक दर्द
हर मौन में एक चीख

शब्द हैं पर कोई सुनता नहीं
दीवारें हैं पर कोई छूता नहीं
अकेलेपन की यह धारा
बहती रहती है निरंतर

कभी हँसता हूँ, कभी रोता
किसी से कुछ नहीं कहता
यह अकेलापन मेरा साथी
मौन गवाह, मूक सराही