जहाँ खुद से मुलाकात होती है,
और दिल के राज खुलते हैं,
अकेलापन, नहीं है वीरान,
यह तो बस एक सोच का मायाजाल है।
दुनिया की भीड़ से दूर,
इस खामोशी में गूँजती अपनी धुन,
जैसे अनसुनी आवाज़ों की तलाश,
जो खुद को खोजने का सफ़र बन जाए।
हर खामोश लम्हा खुद से बातें करता,
हर एक ख्याल से नया रिश्ता जुड़ता,
अकेलापन, एक खाली कैनवास,
जहाँ अपने सपनों के रंग भरता।
नहीं है यह विरानी का संसार,
ये तो है आत्म-खोज का अद्भुत उपहार,
जहाँ खुद से मिलने का मिलता है आँगन,
अकेलापन, नहीं है शून्य, यह है वृंदावन।