अकेलापन की परछाई

इस भीड़ में, कहीं खो जाता हूँ मैं,
अपने ही ख्यालों में उलझ जाता हूँ मैं।

मुस्कुराहटों के पीछे छुपा एक सन्नाटा,
जहाँ शोर के बवंडर में भी सन्न सन्न करता सन्नाटा।

दोस्तों की महफिल और गुफ्तगू भी,
पर सीने में लगता है जैसे कोई शून्य घूम रहा।

यह अकेलापन नहीं, कहानी है मेरी खुद से मिलने की,
जहाँ मैं और मेरी आत्मा करते हैं गुफ़्तगू अकेले में।

सीखा है अकेले भी खुश रहना,
जिंदगी की रफ्तार में अपने अक्स को पहचानना।

इस अकेलेपन ने जोड़ा है मुझे मेरे साथ,
अंधेरों में भी खोज लिया है खुद का हाथ।