रिक्त कमरे में बैठा हूँ मैं
चुप्पी के सागर में डूबा हुआ
दीवारें साक्षी हैं मेरी निःशब्दता की
मौन आवाज़ें करती हैं फुसफुसाहट
कभी-कभी याद आते हैं चेहरे
जो अब बस तस्वीरों में रह गए
हाथ बढ़ाता हूँ, पर कोई नहीं मिलता
अकेलापन मेरा एकमात्र साथी
रिक्त कमरे में बैठा हूँ मैं
चुप्पी के सागर में डूबा हुआ
दीवारें साक्षी हैं मेरी निःशब्दता की
मौन आवाज़ें करती हैं फुसफुसाहट
कभी-कभी याद आते हैं चेहरे
जो अब बस तस्वीरों में रह गए
हाथ बढ़ाता हूँ, पर कोई नहीं मिलता
अकेलापन मेरा एकमात्र साथी