अकेलेपन की गहराई

अकेलापन, वो साथी है जिसे ना कोई बुलाता,
धीरे से आता और अपनी जड़ें जमा जाता।

कभी लगता है भार, कभी देता आज़ादी की खुशबू,
ये कैसी विडंबना है, जो भीतर तक उलझा जाती।

अकेलापन, वो गुरु है जो सिखाता है स्वयं से प्यार करना,
शोर में भी, सन्नाटे का मार्मिक महत्व समझाता।

कभी वो डराता है, कभी गले लगाता,
अकेलापन, निजी कक्षा में जीवन के पाठ पढ़ाता।

मगर जब हम सीख जाते हैं हंसना, रोना, जीना उसके संग,
वो धीरे से मुस्कुराता है और कहता, 'तुम अब खुद को पाया।'

अकेलापन नहीं, बल्कि एक सफर है आत्म-खोज का,
जहाँ खत्म होती हैं सभी सीमाएँ, वहीं खुद पे विजय पाया।