अकेलेपन की राह पर, चलता एक साया,
खोजता मंजिलें नई, मगर दिशा न पाया।
घिरा हुआ सन्नाटों में, बिना किसी का साथ,
मन की गहराईयों में छुपा, एक अनकहा जज्बात।
उसने देखा चाँद में, एक टूटता तारा,
सोचा शायद उसकी तरह, वो भी है अकेला सारा।
पर चमकते सितारों ने, दिया उसको ये संदेश,
अकेलापन नहीं अभिशाप, चुप्पी भी होती है खास।
ज्यों ज्यों वो चला अकेला, खुद से मुलाकात हुई,
अंधेरे में पाया खुद को, खुद की रोशनी बनी।
अकेलापन तो बस एक लम्हा, खुद से गुफ्तगू का,
जहाँ खुद की सुनी, खुद की बुनी, खुद की तरह जूझा।
तो अकेलेपन की इस राह में, मिली जीने की वजह,
अकेलेपन में ही पाया, सच्चे रिश्तों का जहाँ।