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अखियाँ मेरी रोती है

दिन हो या सांझ
निंदिया मेरी खोती है
सुबह शामों
तेरी अश्कों मे रोती हूं
तेरे दर्द से
अखियाँ मेरी रोती है......
तेरी बतिया से
मै घुट घुट जीती हूं
ऐ खुदा,
तू दो वक्त का मोहलत
चुरा ले मेरे दामन से....
क्यों की
उसकी बातों से
अखियाँ मेरी रोती है......
ख्वाइश समझा था मेने
जज़्बात से खेला था उसने
हमदर्द, हमसफ़र
समझा था मेने
आज उसकी बातो से
अखियाँ मेरी रोती है......
सुबह साँझ निन्दियां मेरी खोती है
उसकी बातों से
अखियाँ मेरी रोती है.......
-Durga(Diya)
©diyadeepak