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अल्फ़ाज़

कतरा कतरा सी रह गई मेरी नदानी,
अफ़सोस हुआ मुझे भी, फिर भी पता नहीं चला ।

गम में नहीं डुबा हम, पता तो चला नहीं,
क्योंकि मेरी मजबुरीयां था हवा से बात करना!!
©ALOK ANAND