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अल्फ़ाज़ अपने अपने।

आज तक हम तुम्हारी ही रचनाएं पढ़ते पढ़ते ऐ महान बुद्धीमान लोगों तुम्हें पढ़ते पढ़ते हमें भी कुछ लिखने का मादा जागॄत होगया।
वैसे तो हम कोई लेखक तो नहीं हैं परन्तु जो कुछ भी है मामूली ही सही कुछ तो लिख ही डालेंगे अब तुकांत वगैरह तो हम जानते नहीं,चलो फिर भी कुछ कोशिश तो करें।
हमारे पास लिखने को एक अदद मोबाइल का सहारा ही हैं,इस बार भले ही आपको पसंद न भी आएं कम से कम लिखने का अभ्यास ही सही कुछ तो नफा हो ही सकता है।
अरे कवियों तुम मेरी बेसार कविता ध्यान से ही पढ़ना क्युकि हमारी कविता पढ़ते पढ़ते कहीं तुम अपनी कविता न भूल जाओ।
कवीवरों कहां तुम्हारे अल्फाजों का अनोखा मेल और मेरी ये उल्टे अल्फाजों की ऊबड़‌ खाबड़ ठेठ बे मेल रचना।
कवीवर महासयों तुम्हारी कविता और तुक बन्दी का कमाल की दुनिया भर की भीड़ ‌का हूजूम लगादे।
कवी प्रवीणों मेरी कविता की खाशीयत इतनी कि सारी भीड़ पल भर में ही छंट कर सारा लगा जाम हटादे।
कवीवरों कहीं भूल कर भी यह मत करें कि मुझे कवी समेलन में न्योता मत द‌ईओ क्यौकि मेरी कविता के फूहड़ अल्फाजों से आफ़त बरसने लगे।
कवीराज मान्यवरों मेरी लिखी कविता में बाई की जगह रांड तो रांड की जगह बाई सबद रो उपयोग कदेही घणों हो जाय जिनसे फूलों की जगह पत्थर सूं सामनों करणो पड़ सके।
कवी सिरोमणीयौं इस तरह की सावधानी और व्यवस्था सुनिश्चित करने पर ही मुझ सरीखे बुद्धि के बादशाह कवी को आमंत्रित करें और भागने का रास्ता पहले तय करें।

कविराज की पदवी बहुत बड़ी है यह हम सुनते आये हैं कहते सुना है हमने कि जहां न पहुंचे रवि जहां पहुंच जावे कवी।
कवि साहेबान मेरी कविता ऐसी कि जहां पहुंचा हुआ कवी भाग आवे तुरंत मेरी कविता सुनने अभी,फिर जावे न कभी।
कवियों तुम इतना भी मत इतराओ अरे कभी जीते जी मेरी कविता सुनने पढ़ने की ललक लग गई तो फिर तुम जानलो कि मेरी कविता के मोह पाश में बंधकर मेरी कविता ही सुनते रह जाओगे।
कवियों ग्यान दाताओं मेरी कविता सुन अगर में नरक में भी रहूं तो तुम अपना स्वर्ग छोड़ कर नर्क में जाओगे और सोना छोड़ कर जाग जाओगे।
कवि महानुभावों मेरी कविता में सब गुण ही भरे पड़े हैं बस सुनना तो पड़ेगा ही क्योंकि मेरी कविता में केवल हानि के अलावा कुछ भी तो नहीं हैं और ज्ञान के सिवाय सब कुछ है।
कवि प्रदीपौं मेरी कविता में लाभ के सिवाय सब कुछ है
और हां मेरी कविता में सुख शांति समृद्धि के सिवाय सब कुछ है, ईमानदारी के सिवाय भी सब कुछ भरा पड़ा है।
कवियों कविता लेखकों आज नहीं शुरू से ही फार्मूला है कि आचार वान बनने के लिए आचारके आगे भ्रष्टा और ईमान से पहले बे लगाना जरूरी है।
जय मानवता।
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