K

अनजान राह

कितनी अनजान राह पर,
बस यूं ही भटकते भटकते आगये,
कुछ मंजिल की चाह थी,
और कुछ बिन काम आगए।
साथ की ख्वाहिश में,
किसी को ढूंढते आगाए,
अकेले हो गए बस अकेले,
कितनी अनजान राह पर,
बस यूं ही भटकते भटकते आगये।
खोया है बहुत कुछ राह में,
पाया कुछ ज्यादा था।
जानी पहचानी गलियों से निकले,
अनजान राह को अपना बना लिया
कितनी अनजान राह पर,
बस यूं ही भटकते भटकते आगये।
©khempoitry