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अनोखा रस्ता

सर्दियों से बसा था वो
न जाने किसके लिए;
एकदिन मुलाकात हुई उससे,
जिसके लिए सबकुछ छोड़ आया था वो।
दिल पे दर्द भरा था
चेहरा फीका परा था
न जाने किसके लिए
ये आत्मा दुखी परा था।
देर से एकदिन, ऐसा हुआ-
एक चमतकार कहा से आया
जिसके लिए वो तड़प रहा था
मानों खुशियाली बन कर आयी।
पूछने से उसे उत्तर मिला
जो हाल उसका था;
ना कॉम ना ज़्यादा
उसकी भी थी।
मोजबूरी थी उसकी
जो समय पे न आ पाई;
पर कसूर भी नहीं
क्योंकि समय रहते ही आई।
©ayanav