दृढ़ निश्चयी अनिरुद्ध अड़ा है ,
ना कोई विरुद्ध खड़ा है।
जग की नज़रों में काबिल पर ,
चेतन अंतर रूद्ध डरा है।
घन तम गहन नियुद्ध पड़ा है ,
चित्त किंचित अवरुद्ध बड़ा है।
अभिलाषा के श्यामल बादल ,
काटे क्या अनुरुद्ध पड़ा है।
स्वयं जाल ही निर्मित करता ,
और स्वयं ही क्रुद्ध खड़ा है।
अजब द्वंद्व है दुविधा तेरी ,
मन चितवन निरुद्ध बड़ा है।
तबतक जगतक दौड़ लगाते ,
जबतक मन सन्निरुद्ध पड़ा है।
किस कीमत पे जग हासिल है ,
चेतन मन अबुद्ध अधरा है।
अरि दल होता किंचित हरते ,
निज निज सेउपरुद्ध अड़ा है।
किस शिकार का भक्षण श्रेयकर ,
तू तूझसे प्रतिरुद्ध पड़ा है।
निज निश्चय पर संशय अतिशय ,
मन से मन संरुद्ध लड़ा है।
मन चेतन संयोजन क्या जब ,
खुद से तेरा युद्ध पड़ा है।
अजय अमिताभ सुमन
©ajay7
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