अतीत का जाल

अतीत के पन्नों पे जब उंगलियां फेरी,
यादों का जाल सा, मन में समा गया।

वो बीते लम्हे, खोये सपने,
जैसे कहीं धूल में मिला, आधा भूला हुआ।

कुछ हंसी खुशियाँ, कुछ अधूरी कहानियाँ,
फिर से जीने का मन करता है, पर अतीत है कि बहा गया।

यादें हैं कि अंगार बनी, मन के कोने में सुलगती,
हर लम्हा, हर याद, जीवन की तस्वीर बुनती।

अतीत से मुलाकात होती है, जब भी यादों में डूबा,
कहीं खुशी, कहीं गम का मेला, जैसे जीवन का फैला।

यादें और अतीत, जीवन के दो पहेली,
जो बीता वो सपना, जो है सामने वो जिंदगी।