अतीत की गलियों में, यादों के झरोखे खुलें,
हर कोने में लगता है, सपनों का मेला जुलें।
उन यादों की चादर में, लपेटे हम बचपन को,
खेल खिलौने, पुराने संगी, याद आते हैं सब अपनों को।
मीठी-मीठी बातों से, सजी है वो पुरानी डायरी,
हर पन्नों में छिपे हैं, कुछ अनकहे, कुछ प्यारे से सफर की कहानी।
अतीत की इस गली से, जब भी जाता है मन,
यादें बिखरे फूलों सी, खिल उठती हैं उन्माद से बन।
पर अतीत से चिपके रहना, किसे भला सुहाता है?
यादें तो बस संजोने की, कल के लिए नई आस जगाता है।
तो चलो, यादों का दरवाजा खोलें, पर अतीत में न खोएं,
आज की धुन में जीयें, कल की सुनहरी सुबह को चुनें।