भौंर कहते है .....
डाली पे बैठा मैं झांके जा रहा,
देख कलियों को मन ही मन मुस्कुराए जा रहा ।
बैठा जब मैं उस कली की पंखुड़ियों पे,
मधुर रस को अपने मैं समाए जा रहा ।
भर उठा जी जब मेरा,
छोड़ के उसको मैं निकल पड़ा ।
फिर कभी जब मैं आऊंगा,
मधुर रस पी के चला जाऊंगा।
पंखुड़ी कहती है.....
मैं कली इक नादान सी,
कोमल मेरा जिस्म है ।
तुम आके मुझसे लिपट गए,
मेरे जिस्म की रूह को पीके चले गए।
क्या कसूर है मेरा की,
हूं मैं कोमल और नादान सी ।
बस करो ये अत्याचार अब तुम,
देख के तुमको झुलस दूंगी ।
आज तुम बेखौफ नजर आओगे ,
एक दिन तुम भी नरक जाओगे ।
कोमल सी नादान सी पहचान हूं में ,
भारत मां की नन्ही सी जान हूं मैं ।
@संजय रावत
pantwari उत्तराखंड
©sanjulv
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