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बेईमान कौन?

~ कल रात ट्रेन से यात्रा के दौरान अजीब सा वाक़या घटित हुआ। अक़्सर ऐसा नहीं होता है मग़र शायद ये होना ही था।
~ ट्रेन टिकिट लेते समय मेरी कोशिश रहती है कि अपर बर्थ मिल जाए, लेकिन तत्काल टिकिट में सीटों का रेंडम सिलेक्शन होता है इसलिए लोवर बर्थ मिल गई। लोवर बर्थ में रिज़र्वेशन होने के बावज़ूद भी लोकल ट्रेन वाली फ़ीलिंग बरक़रार रहती है, क्योंकि रात दस-ग्यारह बजे तक लोग उस सीट पर बैठे रहते हैं।
~ ख़ैर सीट जो भी हो यात्रा तो करनी ही थी, पाँच घण्टे सीट पर बैठे रहने के बाद जैसे ही अगला स्टेशन आया कुछ लोग उतरने के लिए सीट से खड़े हुए, इतने में पुलिस के तीन सिपाही हथकड़ियों में जकड़े हुए एक व्यक्ति को लेकर दाख़िल हुए और मेरी सीट पर काबिज़ होने को प्रयासरत दिखाई दिए। इस आशंका को भाँपकर मैंने बीच की सीट खोल दी, और पुलिस वाले उस सीट पर बैठने को तैयार हो गए।
~ मैंने राहत की साँस ली कि अब आराम से सो सकूँगा लेकिन किसी अनिश्चय की आशंका से लगातार मन परेशान ही रहा। रात लगभग ढाई-तीन बजे कुछ गिरने की आवाज़ से मेरी आँख खुली। तभी बीच की बर्थ पर सोए सिपाही ने हाथ के इशारे से मुझे जगाने का प्रयास किया। मेरी सीट के नीचे रखे उसके जूते देखने के लिए वो ऐसा दो-तीन बार पहले भी कर चुका था, इसलिए मुझे लगा अबकी बार भी यही पूछने वाला है, लेकिन वह बोला- मेरा फ़ोन नीचे गिर गया है। मैंने देखा फ़ोन नीचे ही था, इसलिए उठाकर उसके हाथों में पकड़ा दिया।
~ नींद तो अभी तक कच्ची ही थी इसलिए मैंने दुबारा सोने का प्रयास शुरू किया। और तभी अचानक मेरे सामने वाली लाइन में बीच की बर्थ वाला आदमी नीचे उतरा और उसके नीचे वाली सीट पर सोए बुज़ुर्ग से पूछने लगा- काका मेरा फ़ोन गिर गया, आपने देखा क्या?
~ मैं अभी तक आधी-अधूरी नींद में था, लेकिन ये शब्द सुनते ही समझ गया कि वो 'अनिश्चय वाली आशंका' सच साबित हो गई लगती है।
~ लेकिन मैं पूर्णतः आश्वस्त नहीं था कि वह फ़ोन आख़िर था किसका?
~ उस सिपाही का या फ़िर सामने की सीट वाले आदमी का।
~ इसलिए मैंने किसी से कुछ कहना उचित नहीं समझा। और यही बात सोचते-सोचते मेरी आँख लग गई कि आख़िर "बेईमान कौन?"
● वो सिपाही, जिसने किसी दूसरे के फ़ोन पर अपनी नीयत ख़राब कर ली।
● अपना फ़ोन ढूंढने वाला वो आदमी जो घटना के 10 मिनट बाद ऐसा व्यवहार करने लगा जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
या फ़िर
● "मैं" जो सही-ग़लत की उधेड़बुन में उस वक़्त चुप रहा.....
पुनश्च :- जब हम किसी बात के सही या ग़लत के निर्धारण में असमर्थ हों, तब क्या करना चाहिए? यही समझ नहीं आता। क्योंकि जब हमें घटना की पूर्ण जानकारी नहीं है, तब हम ग़लत फ़ैसला भी ले सकते हैं इसलिए जब तक आप पूर्णतः आश्वस्त न हों तब तक फ़ैसला विचाराधीन रखना ही बेहतर है।
©mkmaddy