बेरोजगारी की लंबी सड़क पर
पंक्तियों में खड़े युवक है
अंधेरी पतली राहों पर
गाडे नजर खड़े है
अनजानी अनचाही राहो पर
बेरोजगार खड़े है।
डिग्रीयों के थैले भरे है
योग्यताओं के पर्चे पडे है
असफलताओं के वार से
चेहरे उदासी से जडे है
अनजानी अनचाही राहो पर
बेरोजगार खड़े है।
आंखों में दर्द झलकता
उम्मीदों का मर्म पिघलता
अंदर से टूटकर भी
होंठों पर झूठी मुस्कान लिए है
अनजानी अनचाही राहो पर
बेरोजगार खड़े है।
उत्तरदायित्वों के पहाड़ तले
जीवन पल पल दब रहा है
मोटी मोटी किताबों में
यौवन घुटने लगा है
अनजानी अनचाही राहो पर
बेरोजगार खड़े है।
कुंठित है भाग्यविधाता
तरुणित है भारत माता
अपने पुत्रो की दीन दशा पर
हिमालय मस्तक झुकाकर खड़ा है।
अनजानी अनचाही राहो पर
बेरोजगार खड़े है।
By
Dheeraj Gusain
©dheerajs
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