K

बेटी हूँ...

क्या हूँ मैं , कौन हूँ मैं , यही सवाल करती हूँ मैं...
लड़की हो , लाचार , मजबूर , बेचारी हो ,
यही जवाब सुनती हूँ मैं...
बड़ी हुई जब समाज की रस्मो को पहचाना ,
अपने ही सवाल का जवाब
तब मैंने खुद में ही पाया...
लाचार नहीं , मजबूर नहीं ,
एक धधकती चिंगारी हूँ मैं ,
छेड़ो मत जल जाओगे , दुर्गा और काली हूँ मैं...
परिवार का सम्मान , माँ बाप का अभिमान हूँ मैं ,
औरत के सभी रूपों में सबसे प्यारा रूप हूँ मैं...
जिसको माँ ने बड़े प्यार से है पला ,
उस माँ की बेटी हूँ मैं...
सृष्टि की उत्पत्ति का प्रारंभिक बीज हूँ मैं...
नये-नये रिश्तो को बनाने वाली रीत हूँ मैं...
रिश्तो को प्यार में बांधने वाली डोर हूँ मैं...
जिसको हर मुश्किल में संभाला ,
उस पिता की बेटी हूँ मैं...
©krishu...