कभी आना न! खिड़की के पास
बात करना
मौन रहकर
आंखों के रतजगे
दिखा जाना
अंतर की वेदना
उजागर कर जाना
आरोपों के सागर में
डुबकी लगा जाना
शर्तों की सिसकियों में
घावों की हिचकियों में
यादों की हवाओं को
भेज देना चिट्ठियों में
कभी आना न! चांदनी रात में
चांद को निहारने
रात के आंगन में
श्रृंगार कर
देह को निखारने
मरूस्थल की रेत सा
मैं अवाक् तुमको निहारूं
तुम भी प्यासा बादल बन
बरसने की बाट जोहना..
बीते दिनों की
तब याद तो आयेगी
थमे थमे भावों को
पंख लगा जाना
बीते दिनों में
न भर सके जो उड़ान
उस आस को
जगा जाना...!
©jiwan
J