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बलात्कार

बलात्कार कि और एक वारदात,
मगर निषेध तभी करेंगे, जब ऊंची होगी उस बेटी कि जात।
फिर कुछ दरिंदे रौंदेगे, बच्चियों को, बेटीयों को और बहुओं को।
और निठल्ला समाज चुपचाप सब देखेगा,
क्युकि जुर्म के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए,
समाज अपराधी के धर्म और जात को परखेगा।
अगर गैर समाज का है,तो छोड़ेगा नही,
अगर अपना हि है, फिर समाज कुछ बोलेगा नहीं।
क़या सच में अपराधीयो का,कोई धर्म या जाति होती है,
क्या देश कि हर बेटी,सब कि कुछ ना कुछ नहीं होती हैं?
कितनी हैवानगी से नौचा होगा,उसको बेशर्मों ने,
हम आवाज तक न उठाए, फिर क्या फर्क है,हम लोगों में।
अगर अब भी, किसी का दिल पसीजता नहीं,
तो माफ़ किजिएगा, ये कहना पड़ेगा, समाज हि अंधा है, अपराधीयो कि कोई गलती नहीं।
कवि:- अभय नारायण ताकसांडे
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