ये कैसे अनदेखे बंधन हैं,
जो हैं मुझे जकड़े हुये।
भविष्य की खुशियों का दे के वास्ता,
वर्तमान में हैं खुशियों को पकड़े हुए।
छूटना चाहता हूँ मैं इनसे,
पर ये मुझे और जकड़ लेते हैं।
छीनना चाहता हूँ जो खुशियाँ अपनी,
तो ये अपनो की आशाओं का वार कर देते हैं।
ये बंधन हैं उस नाग पाश की तरह,
जिससे स्वयं राम न बच पाये,
और तब उन्हें बचाने,
गरूड़ महाराज आये।
मैं भी स्वयं के अंदर,
उस गरूड़ की तलाश करता हूँ,
एक दिन होउंगा इस बंधन से मुक्त,
मैं ये खुद से बात कहता हूँ ।
हो सकूँ इससे मुक्त,
बाजूओ में इतनी ताकत लानी हैं।
छीन सकूँ मैं इनसे अपनी खुशियाँ,
बस इतनी औकात बनानी है ।।
`उदय'
©uday
U