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बंदिशें और विद्रोही कलम ये कलम मेरी, समाज का यह खोखलापन देख कर रुक जाती है, मैं…

बंदिशें और विद्रोही कलम
ये कलम मेरी, समाज का यह खोखलापन देख कर रुक जाती है,
मैं क्या लिखूँ तेरी इस दोहरी नीयत पर, स्याही भी शरमा कर सूख जाती है।
बेटे के जन्म पर गूँजते हैं सोहर, घर-घर बांटी जाती है मिठाई,
बेटी की किलकारी सुनते ही, क्यों छा जाती है मातम की परछाई?
क्यों विधाता की उस सबसे खूबसूरत रचना को कलंक माना जाता है,
सोचती हूँ जब भी यह बात, मेरा रोम-रोम काँप जाता है।
सरेआम चौराहों पर तार-तार करते हो तुम आबरू मेरी,
और बंद कमरों में ढोंग रचाकर कहते हो मुझे 'लक्ष्मी' अपनी?
इस नुमाइश और दरिंदगी पर आख़िर मैं क्या अल्फ़ाज़ लिखूँ,
तुम इंसानों की इस हैवानियत पर, मेरी चीखें भी मौन हो जाती हैं।
'लड़का है, आज़ाद है, भला उसे हम क्यों टोकेंगे!'
गुनाह चाहे वो लाख करे, उंगली हमेशा बेटी पर ही उठाएंगे।
नसीहत देते हो कि 'इज़्ज़त रखनी है तो आँचल में छुपा कर रखो,'
बेटों को भेड़िए बनाकर, बेटियों को ही पिंजरे में कैद रखो?
तेरी इस सड़ी-गली सोच को देखकर, मेरी कलम बगावत पर उतर आती है।
गर्व है मुझे अपने वजूद पर, बेटी होने का कोई मलाल नहीं,
सोच बदलनी है तो बदलो समाज, अब मुझे तुम्हारी परवाह का कोई ख़्याल नहीं!
💞 Sona 💞