््््््स्वरचित कविताएं्््््
्््बस चाहने की देर है््््
रुके न तू ,थके न तू,
निरंतर कर प्रयास।
आन्धि सा तू भारी हो ,
तलवार सा कर।
उस कंटिली पेड़ कि छोर से
मिल जाएंगे हजार बेर है
बस चाहने की देर है््््
बस चाहने की देर है््््
उस स्पीड ब्रेकर सा जटिल बन
जो हर चालक को परेशान करे
ईतने कष्ट सहकर
वाहन को छाती पार करें
दुर्घटना से बचाकर
परिवार मिलाने का काम करें
सभि के साथ ऐसा उपकार कर
वाहन चालक एक दिन खुद तूझे सलाम करें
उस कंटिली पेड़ कि छोर से.....
बस चाहने की देर है........
बस चाहने की देर है........
उस वाहन कि पहिए की तरह बन जो
निरंतर रुकावटों को पार करे
राह मे कांटे , गढ्ढे जितने आए
चुनौती समझकर स्विकार करें
नवोदय का है तो धुएं कि तरह
ऊपर उठना सीख
उस कंटिली पेड़ कि छोर से.....
बस चाहने की देर है........
उस धार के विपरित नाव बन
जो धार को चीरकर आगे बढ़े
रात हो चाहे बिजली न हो
अपने को एक मिशाल तैयार कर
अंधेरे मे भी तू चमकती रौशनी डाल
और अजेय का निर्माण कर
उस कंटिली पेड़ कि छोर से
मिल जाएंगे हजार बेर है
बस चाहने की देर है््््
।।।।अजय अंचल।।।।
©ajayanchal
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