भुला दिया तूने प्रकृति का एहसान,
ले रही वह गिन गिन कर,
यह उसका प्रतिकार ही तो है,
कभी स्वादिष्ट मांसाहार के नाम पर,
किया था जो निरीह प्राणियों का कत्ल,
यह उसकी चीत्कार ही तो है ।
खुदा के बराबर खुद को समझ बैठा था,
भूल गया था तू मानव ,
फ़कत एक जर्रा ही तो है,
धरती की ममता का गला घोंटते घोंटते जो तूने,
उफ़ तक नहीं की,
अब वह भूल गई अपना वात्सल्य ही तो है।
चला था चांद से मंगल की ओर,
बढ़ रहे थे तेरे कदम,
नित नए आयामों की ओर,
खोजने चला था चांद पर ,मंगल पर जल और ऑक्सीजन! नज़र आ रहा है,
अब धरती से भी मिटता तेरा जीवन।
कुछ महीनों में ही समझ में आ गई तेरी होशियारी,
तू उसका खेल नहीं समझ पायेगा,
महज़ एक माटी का पुतला ही तो है।।
बस इतना ही तो है।
वत्सला ( स अ)
प्रा वि बहरमा पुर
शिव राज पुर
कानपुर नगर
©vatsalasin
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