N

ब्यंग्य

मंद - मंद सब बदल रहा
अब वक्त भी वायरस से संभल रहा,
कोई चिंता क्या करे?
जिंदगी जैसे पहले चल रही थी अब भी वैसे चल रहा।
कुछ ही पर क्यों इसका बुरा असर है?
कहां गई सब दुनियादारी
क्या मानव धर्म सब भूल गए?
जब से पाव पसारी है महामारी।
सहायतार्थ की न्याय कहा गई?
कुछ तो दया करो असहायों पर
सच नहीं तो झूठा ही सही!
कितनो की तो आश जीनव का
छीन लिया लकडाउन ने
कॉरोना को हम क्या कहे?
रोजगार से बेवबफाई की औद्योगिक टॉउन ने।
गुजर रहा कि गुजार रहे दिन
किसी को कुछ अनुमान नहीं
महामारी से तो सब अवगत है,
इसका असर किंस पर ज्यादा है
किसी को इसपर ध्यान नहीं!
कहने के तो सब कहते है -
" घर पर रहो , सुरक्षित रहो।"
क्या कोई जीने की उम्मीद भी दिखाता है?
अन्न,सांस के बिना भी जिया जा सकता हैं
क्या कोई ऐसा मंत्र सिखाता है?
धन्य हो ऐसी मानवता,धन्य हो ऐसी महामारी
धन्य हो ऐसा मानव समाज, धन्य हो ऐसी कालाबाजारी।
©Nilesh K