ऐ चाँद , तुझमे भी गुरुर बहुत है।
शायद इसलिए क्योंकि तू दूर बहुत है।
मन मेरा छूना चाहता है तुझको पलभर के लिए,
वजह ये की तू अपनी ऊंचाई पर मगरूर बहुत है।
ना सता मुझे यूँ, न कर परेशान इस कदर,
रूठी रूठी सी ज़िन्दगी में शिकायतें बहुत है,
क्या होगा गर मैं न लिखूं तुझ पे थोड़ा भी,
जमाने भर में तेरे किस्से और कहानियां बहुत है।
साथ है तेरे ये सितारे और शीतल चांदनी,
रहम कर मुझपे, मेरे साथ तन्हाई बहुत है,
गर साथ छोड़ दे चांदनी तो तेरी बिसात क्या है?
तब जानेगा शायद तू भी इस दुनिया मे दर्द बहुत है।
शबनम की गिरती बूंदों पे इतराना छोड़ दे तू,
मेरी आँखों मे भी पानी का सैलाब बहुत है,
खामोशियाँ इस रात की कर रही हैं बातें तेरी,
खामोशियों के सीने में भी अरमान बहुत हैं।
"रतन"
©ratanbagwa
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