चांद पर बस्ती बसाने चले थे जमीन पर घर नहीं है
कितना खर्च होता है यह तो सबको पता है दोस्तों
मगर चांद पर अभी खोज जारी है बस्ती बसाने की
मगर कितना बस आप आओगे लोगों को चांद तुम
रहने दो तुम चांद को बस्ती बसाने की छोड़ना अभी
अभी जमीन पर इंसानियत को बचाना जरूरी है अब
ईश्वर की तलाश में निकले थे लोग अभी मिला नहीं
मगर जिस ईश्वर की तलाश तुम कर रहे थे ये कैदी हैं
नास्तिक हूं मगर प्रकृति का उपासक भी हूं दोस्तों
नास्तिकता होना अभिशाप बन गया क्योंकि प्रकृति
कितना बेहतर ईश्वर की तलाश तुम इंसान में करते हैं
जानते हो तर्क तुम करते हो तो लोग नास्तिक मानते
सच ही तो है कि नास्तिक होना आपके जीवन का मूल्य है
क्योंकि आप प्रकृति से कुछ सीखना चाहते हैं जो जानती
आप प्रकृति को पूजते हो मगर उस को बंधक बनाकर
बुद्ध की जिज्ञासाओं का अंत से संसार से मुक्ति मोक्ष था
उपासक बन जाओ तुम प्रकृति के पूजो तुम उसे निराकार फिर तुम देखना शायद तुम्हें आत्म संतुष्टि मिलेगी प्रकृति
मैं जानता हूं मेरे विचार कुछ अलग है क्योंकि जिज्ञासु हूं
मगर प्रकृति के निराकार रूप के प्रति जो जीवंत अनादि
स्वरुप सृष्टि का निर्माण और मानवता का कुछ पल सृष्टि
आप जब सृष्टि के विरुद्ध हो जाओगे तो सृष्टि बदलती है
प्रकृति अपना संतुलन अपने अनुसार बनाती है और फिर
प्रकृति आदि अनादि अनंत यही तो प्रकृति का स्वरूप है
©lawnishtha
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