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#चांद की चांदनी

चांद की चांदनी
इस अमावस रात की चांदनी इतनी तेज क्यों ह?
चांद तो दिख नहीं रहा प्रकाश इतना जोर क्यों है?
आंख खुले तो देख पाऊं, यह मेरे छत पर कौन है?
चांद को जैसे चकोर, इस तरह सता रहा कौन है?
जहां हमारा आपके नाम है सताना अब बेकार है!
जुल्म निगाहों की सजा यह दिल क्यों भूगते
आंखों को खुद से जुदा भी नहीं कर सकते
यही तो रास्ते हैं ,आपके आने का दिल में
बादल और चांद के खेल में
व्याकुल मेरा मन है, व्याकुल मेरा मन है।
प्रवीण उर्फ प्रिंस
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