चारदीवारी के अंदर
ख्वाबों को पलते देखा है
धुंधली लाइट के ज्योति में
तारों को डुबते देखा
जो निकले थे घर से भविष्य बनाने
फांसी पर झूलते देखा है
बुड्ढे मां बाप के आंख में
निरन्तर आसू बहते देखा है
बहनों ने जो राखी के कर्ज से
भाई को दबाते देखा है
चारदीवारी के अंदर
ख्वाबों को पलते देखा है
कर्ज लेकर कर ली पढ़ाई
ब्याज में जीवन डूब गया
शेष बचा आवेदन फिस में
रोम रोम कर्ज में डुब गया
लंबित पड़ी भर्तियां सालों से
फिर भी डींग हांकते देखा है
चारदीवारी के अंदर
ख्वाबों को पलते देखा है
नौकरी चाह में उम्र बिती
तैयारी से मन ऊब गया
देश सेवा और कर्तव्य पालन के
कुछ शब्द दिल को चुभ गया
बड़े बड़े हुनरमंदों को भी
ख़ाक छानते देखा है
चारदीवारी के अंदर
ख्वाबों को पलते देखा है
©ramnivas
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