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छबि

घर से निकलता था, तेरी छबि लेकर...(2)
कभी तेरी रोती हुई यादें लेकर,
कभी तेरी हस्ती हुई बाते लेकर.....
कितना रोकती थी, मुझे जाने के लिए...(2)
फिर भी
में तत्पर रहता था देश की रक्षा के लिए.......
घर से निकलता था, तेरी छबि लेकर...
घर से निकलता था, तेरी छबि लेकर...
मौत आ जाये मुझे,
इसकी परवाह नहीं,
हस्ते हुए लुटा दूँगा मेरी जान
और
दुश्मनों का ख़ून बहा दूँगा यहीं...
घर से निकलता था, तेरी छबि लेकर...
घर से निकलता था, तेरी छबि लेकर...
_Durga(Diya)
©diyadeepak