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चीज़ें बदल चुकी हैं

कुछ दिन पहले तक ज़िम्मेदारीयो से नाता नहीं था,
मगर कभी ऐसा भी हो जाएगा यह खयाल आता नहीं था।
जब कभी भी ज़िन्दगी क द्वंद मे खडा था,
एक पुकार मे एक शख्स हल लिए खडा था।
अब हालात कुछ ऐसे हैं कि अपनी उम्र से बडा होना पड गया है,
जैसे बिन मौसम बारिश मे बिन छाते खडा होना पड गया है।
ज़िन्दगी की बारिश में भी छाता बहुत मज़बूत हो यह ज़रूरी नहीं है,
क्योंकि यह खयाल ही बहुत है कि मुझे कहीं पनाह लेने की ज़रूरत नहीं है।
अब काफ़ी उम्मीदें मुझ से जुड चुकी हैं,
बचपने की चादर बदन से उड चुकी है।
यह सब मेरे साथ ही क्यों हुआ इस बात की शिकायत नहीं है,
क्योंकि खेल के उसूल हमें मालूम नहीं थे इस बात से मुकरने की आदत नहीं है।
©prakharbro