वो दौर ही कुछ और हजूर था
जब तेरे ही नाम का जहूर था
उरूज ऐसा कि क्या कहे हम
इबताद ए इश्क का सरुर था
जीत लिया हर एक को ऐसे
कोई हुनर तो तुझमें ज़रूर था
तेरी नदामत के किस्से सुने है
इसी चीज़ का तुझे गरुर था
आज सोचता हूं जब तेरे बारे मे
झुट बोलने का भी तो शौोर था
तेरी नहीं, खता मेरी थी शाहिद
तुझे नहीं , मुझे तेरा फितूर था
©shahidkhan
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