बादलों की औकात भी बदली बदली नजर आ रही है
गरज तो यहां रहे हैं और बरसने कहीं और जा रहे हैं
आंधियों से परेशान हैं क्यों? कई एक पहाड़ बेवजह ही
और तलहटियों को कैसे ख्वामखाह निगले जा रहे हैं
तुम कहां संभले हो मेरी भावनाओं के ज्वार में फंसकर
इसीलिए तुम्हें ईश्वर शराब की दावत में बुलाये जा रहे हैं
कोरोना का डर सता रहा है अंदर ही अंदर किस कदर
इसीलिए घर में आजकल युद्धाभ्यास किये जा रहे हैं
©jiwan
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