मै ना रोक सकूँ सबको
मै खुद को ही जानू
मै खुद को ही पहचानू
एहसास को बना लूँ
विश्वास को जगा लूँ
एक ही सवाल दिल मे उठा लूँ,
दिल!
मैं तुझको कैसे समझा लूँ....
मैं ना रोकू तुझको वहां जाने से
जहाँ दरियों मे सूखा पानी हो
मै रोकू तुझे वहाँ जाने से
जहाँ दिल मे खोखली नूरानी हो
उम्मीद मत जगा तू उस राही से
जहा तू मजाक बन जाये,
कुछ सुखी स्याही से......
दिल!
तू मानता क्यों नहीं है
तू मेरी सुन
तेरी जगह उस दिल मे नहीं है
दिल!
तू मानता क्यों नहीं है
तेरी चाहतो को उसको कद्र नही है..
दिल!
तू मानता क्यों नहीं है.....
दिल!
तू मानता क्यों नहीं है......
-Durga(Diya)
©diyadeepak
D