ए जिंदगी तू इतनी सख्त क्यूँ है?
कभी मेरी जगह जी कर देख
तुझे तुझसे नफरत हो जाएगी
फिर भी ना जाने क्यू तुझे जीने का मन करता है।
तेरे आगोश मे रहकर तुझसे ही लड़ने का मन करता है।।
ए जिंदगी! जब तेरी दौड़ मे शामिल हुई
बहुत गिरी, छोटे खायी और खून भी बहा।
भीड़ ने सोचा, ना उठ सकूंगी अब,ना चल सकूंगी अब
पर मैं उठी भी और आगे बढ़ी भी
अब भी लड़खड़ा रही हूं, पैरो मे ताकत नहीं है
पर मेरे होसलो मे हौसला अभी बाकी है।
अभी दौड़ना भी बाकी है और जीतना भी बाकी है।।
ए जिंदगी!तेरे दिए जख्म दिखते नहीं है,
दिखते नहीं है, पर दुखते बहुत है,
ये जख्म मुझे तेरी बेरहमी की याद दिलाते है
सोने नहीं देते रात भर जगाते है,
ये जख्म ना अब भरने दूंगी
मंज़िल के मिल जाने तक कदम ना ये रुकने दूंगी
हारी नहीं हुँ मैं, हथियार भी नहीं डालूंगी।
हर जंग जीती है ये भी जीतूंगी।।
बस तुझसे एक छोटा सा सवाल है मेरा
थोड़ी सी सहज़ हो जा, इतनी मुश्किल क्यूँ है?
ए जिंदगी!तू इतनी सख्त क्यूँ है?
तू इतनी सख्त क्यूँ है?
✍️शिवन्या
©04shivanya
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