ये आइना जो तुम मुझे दिखा रहे हो,मन ही मन खुद को सता रहे हो ...
खामियां जो तुम मेरी गिना रहे हो,अदब से खुद की छिपा रहे हो...
धुएं का गुबार है ये आसमां में,महल जिससे अपना सजा रहे हो...
खुदगर्ज समझ रहे हो मुझको,बुद्ध खुद को बता रहे हो...
माना कि ज्यादा सयाने हो मुझसे,पर सच्चाई क्यों झुटला रहे हो...
मिट्टी से आना मिट्टी में जाना फिर क्यों दिलो की नफरत बढा़ रहे हो?
©khudrangi
K