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एक बात पूछूँ तुमसे माँ? क्यों कोख में मुझे न मार दिया? इस मतलबी दुनिया से थक…

एक बात पूछूँ तुमसे माँ?
क्यों कोख में मुझे न मार दिया?
इस मतलबी दुनिया से थक कर,
मैंने तो खुद को हार दिया।
इस झूठे समाज के तानों से,
इस अनचाहे अनजाने से,
मैं रूठ गई हूँ खुद से माँ...
एक बात पूछूँ तुमसे माँ?
जब जन्म हुआ था मेरा माँ,
क्या सच में तू रोई थी?
अपनी किस्मत को कोस-कोस कर,
क्या रातों को न सोई थी?
गर बोझ ही थी मैं सर का तेरे,
तो क्यों न गला दबाया माँ?
क्यों ज़िंदा छोड़ दिया मुझको,
क्यों जग का रास्ता दिखाया माँ?
मैं वक्त के साथ बड़ी तो हुई,
पर बचपन मेरा खो गया था,
अभी ढंग से चलना सीखा न था,
कि कंधों पर बोझ ये सो गया था।
मासूम से इन हाथों में मेरे,
क्यों चकले-बेलन थमा दिए?
क्यों जलते चूल्हे की आग में,
मेरे सारे ख्वाब जला दिए?
एक बात पूछूँ तुमसे माँ?
जब मैं पूरी नासमझ थी,
क्यों हाथ ये मेरे पीले किए?
क्यों डोली में मुझे बिठा दिया?
न घर देखा, न वर देखा,
बस 'बेटी है' यह नाम दिया,
और अपनी ही उस गुड़िया को,
पल भर में घर से निकाल दिया।
अब फोन पे मेरी सिसकी का,
क्यों हाल नहीं तुम पूछती हो?
क्या बीत रही इस बेटी पर,
क्यों एक दफ़ा न सोचती हो?
शायद मेरी बस यही खता,
जो मैंने ये जनम लिया,
एक बेटी बनकर दुनिया में,
क्यों मैंने आँख को खोला माँ?
एक बात पूछूँ तुमसे माँ?
क्यों कोख में मुझे न मार दिया...
💞 Sona 💞