अमावस से भी अधिक काली थी,
वो 19 जनवरी की एक रात थी
उस रात दर्द और जख्म मिले थे ऐसे,
आज भी भूल नहीं पाया हूं में इसे
रातो रात कर रहे थे हम पलायन,
अपने ही जमीन से, अपनी ही बोली से
सब छूट रहा था फिसल रहा था,
मूर्ति बन बैठकर लोग देख रहे थे हमें
राजनीतिक दलो ने हमारा किया ऐसा इस्तेमाल,
अपने ही देश में शरणार्थी छावनी में निकाले सालो साल
इस बात का ना संसद में हुआ हंगामा,
ना ही हुआ देशवासीयो के दिल मे
हमारा दर्द समझने के लिए ना T.V. का था सहारा,
नाही पत्रकारो की बुलंद आवाज़े थी
ना सरकार की इसपे थी कोई कार्रवाई,
नाही विपक्ष का कोई वाद विवाद
था तो चारो और अमानवीयता, क्रूरता,
से भरा एक दुःखद सा वातावरण
30 साल गुजारे हमने ऐसे ही त्रासदी से,
अब तो आदत सी हो गई है उससे
ना हमने नफरत फैलाई, ना ही कभी बंदूक उठाई,
ना किसी से कोई दुःख हैं, ना ही कोई ऐतराज़
बस अब सिर्फ़ एक बात खनकती हैं मेरे दिल में,
फिर से उसी मिट्टी को चुमने का मिलेगा मौका एकबार?
--- MIT PATEL
©mit_patel
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