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एक लेखक है

मुझ में कहीं एक लेखक है जो तुम्हें लिखने की हर रोज एक नाकाम सी मगर कोशिश करता है,
तुम्हारे बचपन को,
तुम्हारी बेपरवाह सी हंसी को,
तुम्हारी कुछ ना कहने की आदत को,
तुम्हारी आजादी को,
तुम्हारे बिना कुछ कहे ही प्यार जता देने की अदा को,
तुम्हारी खामोशी को ,
फिर कुछ ऐसा होता है कि,
ये लेखक लिखते-लिखते अचानक ही अटक सा जाता है,
तुम में ही कहीं खो सा जाता है,
लिख भी कैसे पाएगा भला, इतनी आसान थोड़े ही हो तुम,
उस लेखक की मोहब्बत जो हो तुम ,
मुझ में कहीं एक लेखक है.
©shubhamsin