चलो गांव को लौट चलें!
यूं ना अब रहा जाएगा इन शहरों में
जीना यहां मुहाल है
गांव को छोड़ आए किसके हाथों?
शहर के इस कर्कश शोर का
कानों में यह सवाल है,
मुखोटे पहने हैं सबने यहां
एक दूसरे को रिझाने की चाह में
है ना कोई संगी
एक दूसरे की आह में,
हर तरफ आवागमन
भाग रहे हैं सब
दौलत और शोहरत की लालसा में
अर्ध रात्रि में भी जाग रहे हैं सब
यहां आदमी का काम अपना है
आदमी से कोई अपनापन नही
देर रात काम से लौटकर
सुनसान कमरे का कोना पकड़कर
याद आता है और दिल कहता है
चलो गांव को लौट चलें!
बुला रही हो जैसे
सरसों के खेतों की वो भीनी-भीनी महक
घर से स्कूल तक की वो टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियां
और नदियों में बहता हुआ वो
कल-कल निर्मल शीतल जल
चीड़ के पेड़ों के बीच में इष्ट देव का मंदिर
और हरियाली लिए पहाड़ों का वो अंचल
बुला रहा हो जैसे
पिता की डांट में छिपा वो दुलार
मां के हाथों का वो लज़ीज़ खाना
बड़े हुए जिनको लेकर
बचपन के खिलौनों का वो खज़ाना
दस रुपए मिलने पर जाया करते थे जहां
टॉफी खरीदने का वो किराना,
थे जहां के सुल्तान
चलो उस सल्तनत को लौट चलें
चलो गांव को लौट चलें।।
©kalamsingh
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