वह दिल से काश अपने इस क़दर मजबूर हो जाये
हमारे बीच का यह फासला अब दूर हो जाये,
निगाहें बात करतीं हैं ज़बाने बेज़बानी से
जहाँ आकर मुहब्बत में ज़बां माज़ूर हो जाये,
मुहब्बत तोड़ सकती है हर एक ज़जीर दुनिया की
हमारा अज़्म ऐसा हो के ये दस्तूर हो जाये,
जलाये हूँ चिराग़ों को तेरी यादों के मैं वरना
ये मेरी ज़िन्दगी का रास्ता बेनूर हो जाये,
तख़य्युल की हक़ीक़त से मुलाक़ातें ज़रूरी हैं
नहीं तो आईनाख़ाना भी चकनाचूर हो जाये,
हसन ज़ख्मों पे अपने आज तक मरहम नहीं रख्खा
खुदा जाने ये मेरा ज़ख्म कब नासूर हो जाये
(हसन काज़िम अमरोहवी)
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