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घमासान ए जिदंगी

परिंदो सी उडान चाहता हू, मै भी एक खुला आसमान चाहता हू
रास्ता ए जिदंगी मे पहाडो सी चुनौतियाँ बहुत होगी,
मै भी तैयार हू ए जिदंगी तेरे साथ एक घमासान चाहता हू
आखिर कब तक अटकले देती रहेगी तु मेरा ये सवाल है तुझसे
मै तेरा जबाव चाहता हू
कमल सा अस्तित्व है मेरा , खिल रहा हू
और खुशबू ए प्यार की बिखेरना चाहता हू
कुछ ख्वाहिशे है मेरी , कुछ बदिंशे भी है तेरी
मात तो कई बार खा चुका हू तुझसे ऐ जिदंगी , अब मेरी जीत और तेरी हार चाहता हू,
अब तक बहुत सहा है तुझे , अब दो दो हाथ करना चाहता हू
अब आखिरी घमासान चाहता हू
-कमलसिहं
©kamalsingh