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गिरगिट ना कहना दलबदलू कह देना बदनामी

आलोचक आलोचना और दल बदल समीक्षा करो
व्यंग कार व्यंग करता है तीखी आलोचनाओं करके
सच की सच्चाई दिखाता कार्टूनिस्ट है जमाने को
हर कवर एक तीखी नजर रखता पाठक और संवाद
बस गिरगिट ना कहना दलबदलू कह देना बदनामी है
कितना अजीब रिश्ता है गिरगिट का प्रकृति से शिकार
मौका मिले तो प्रकृति के रंग में ढल जाता है शिकार
उसको सिर्फ भोजन की तलाश में रंग बदलना होता
कितने रंग बदलता है और कब बदला जानता वही है
सबसे नजदीक कल रिश्ता है प्रकृति के रंग ढल जाना
अगर यही बात राजनीति पर लागू हो नेता दल बदलू
स्वार्थ के गिरगिट कभी पार्टी बदलते तो कभी सत्ता
जनता एक बार वोट देती है चुनने के लिए गिरगिट
स्वार्थ सिद्धि होनी चाहिए राजनीति तो चलती रहेगी
कुछ हाल नहीं है बदला गिरगिट का राजनीति में
जनता भी क्या करें गिरगिट चुनाव में खड़े होते हैं
वोट तब तक नहीं मिलते जब तक नाक नहीं रगड़ दे
वोट की सत्ता प्राप्त होते ही अब गिरगिट दल बदलेगा
चाहत इतनी की माला इनको पहनाओ मंत्रिमंडल में
बंद करो या तीखी आलोचना आलोचक बन जाओ
कौन किसकी सुनता है यह मलाल नहीं दल दलाल
जनता का हित कुछ लोग सोचते हैं तो कुछ अपना
राजनीति करना बहुत ही कठिन है पढ़ाई से ज्यादा
कुर्ता और पजामा तो सिर्फ दिखावा है सफेदी का
कितनी काली करतूत आ चुकी हैं इस पजामे कुर्ते में
©lawnishtha