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गम

मेरे गम में,
कितना दम है,
मेरा गम भी
मेरा हमदम है।
हर वक्त,
साथ निभाता है,
कभी
छोड़कर नहीं
जाता है।
इसे गुनगुनाऊं,
तो गजल हो जाता है,
छुपाऊं तो टीस,
बन जाता है।
मेरी, गमों की यारी,
आहिस्ता आहिस्ता,
इतने मशगूल हो गई,
कड़वी यादें भी,
अब फूल हो गई।
नवीन
आजाद परिंदा
©azaad