मै भी बैठा था,हजारों सपने लेकर,
गरीबी से मूर्छित कुछ अपने लेकर,
सोचा था अब सपना साकार होगा ,
मेरे घर का भी एक नया आकार होगा,
पर क्या करता साहब......
वक्त का क्रूर पहिया इतना क्रूर हों गया,
कि न जाने मेरा सपना कब दूर हो गया,
टूटना अब रोज की आदत थी ,
मुझे जिंदगी से न कोई शिकायत थी,
अब तो यह काम करना मेरी मजबूरी था ,
बूढे बापू को सम्भालना अब जरूरी था.....।
✍ - -️rajendra inda
©indaraju
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