छाई है वीरानगी चार–सूं, अंदर है शोर बरपा हुआ
ख़ुश आते हैं तबस्सुम लिए, है ये दिल तड़पा हुआ
दिल करता है रोने को बहुत, पर रोएं कैसे फिर हम
जिसका कांधा था अपना,है वो हमसे उखड़ा हुआ
दिल-ए-गुलशन में नहीं खिला फूल फिर कभी जो
टूट कर हुआ शाख़ से जुदा , है ये भी उजड़ा हुआ
©zulqarnain
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