नहीं समझ रहा तबाही मंज़र की,
लगी नहीं न चोट अब तक खंजर की।
मचा है दुनिया में हाहाकार,
समझे खुद को तू कलाकार।
मुसीबत तुझसे आंकी न जारी,
बहुत बड़ी है ये महामारी।
तेरे खातिर कुछ लोंग बहार,
छोड़ अपना घर परिवार।
दिन रात तत्पर हैं बैठे,
तेरे खातिर उनके शरीर हैं ऐंठे।
तूझे बचाने निकला है दसता,
बच्चे उनके देखें उनका रस्ता।
हाथ जोड़े खड़ा है मुखिया,
कहता मान लो मेरी बतिया।
बस इतना सा सहयोग करो तुम,
कुछ दिन घर से मत निकलो तुम।
कड़े कदम हैं जो भी उसने उठाए,
जो उठे कदम तेरे तो पानी फिर जाए।
इस वक़्त राजनीति काम न आएगी,
यह महामारी तुझे खा जाएगी।
उन देशों से कुछ सीख ले भाई,
जिन्होंने शुरू में मौज उड़ाई।
अब कर दिए उन्होंने हाथ खड़े,
देखें आसमान की ओर होके खड़े।
कहत कवि सुन ले ओ भाई,
कुछ न होत जब चिड़िया चुग जाई।
यही समय है जब संभला जाई,
निकला समय तो मलत हाथ रह जाई।
'बहार से बनता तू विद्वान,
है जबकि तू बिल्कुल नादान'
हे इंसान!
~सौरभ पंत
©dilotak
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